आदरणीय संतोष जी को मिलकर बहुत प्रभावित हुई। नाम के अनुसार ही इनके मुख पर संतोष दिखाई देता है।
अब तक सिर्फ दो बार ही मिली हूं पर मैं इन पर पूरी किताब लिख सकती हूं। सच में यह दिल का भाव है या प्यार, कुछ तो है।
पहली मुलाकत हमारे सांझा काव्य संकलन “ख्यालों की रंगोली” के विमोचन पर हुई। इतने प्यार और उत्साह से मिली कि अपना बना लिया।
इनका प्रेम देख कर सोचा था कि अपनी पुस्तक के विमोचन पर इन्हें ज़रुर आमंत्रित करूँगी। मेरा पहला साक्षात्कार भी इन्होंने ही प्रकाशित किया। गाती बहुत सुन्दर हैं, इनकी आवाज़ भी इनकी तरह मधुर है। कार्यक्रम में जब पंजाबी गीत सुनाया तो वहां उपस्थित सभी मेहमानों का दिल जीत लिया। मैंने इनके मुख से पहली बार सुना था।
इनके व्यक्तित्व की किरणें इतनी सकारात्मक हैं कि वो चुम्बक की तरह खींच लेती हैं या यह कह सकती हूँ कि वो प्यारे शब्दों के जाल में फंसा लेती हैं बहेलिए की तरह और वह व्यक्ति उस जाल से निकलना भी नहीं चाहता। इनकी सरलता, सहजता मन को जीत लेती है।
“ख्यालों की रंगोली” में कविताएं भी पढ़ीं हैं। इनकी कविताओं में ईश्वर प्रेम की धारा बहती है अध्यात्मिक,समाजिक व प्राकृतिक भावों को बख़ूबी छुआ है। कविता “प्रेम की पगडंडियां” बहुत अच्छी है। इस कविता में ये सच्चे प्रेम की बात करती हैं। भले ही वह प्रेम प्रभु के प्रति है या देश के प्रति है। सच्चे प्रेम को पाने की लिये त्याग और समर्पण करना पड़ता है। ऐसा प्रेम सन्तोष जी के अंदर दिखता है। अब तक अनेक सम्मान पुरस्कारों से इन्हें सम्मानित किया जा चुका है पर इनसे मिलके बिल्कुल अहसास तक नहीं होता। इतनी विनम्रता कि कोई भी कायल हो जाये। अपनी सादगी और सहजता की वजह से सबके साथ घुल मिल जाती हैं ।
बड़ा वो नहीं होता जिसका ओहदा बड़ा होता है बल्कि जो दूसरे को भी बड़ा बना दे, बड़ा वह होता है। यह बात इनसे मिलकर महसूस हुई।
आप सोच रहे होंगे कि मैं इनसे सिर्फ दो बार मिली हूँ और तारीफ़ करे जा रही हूँ हालांकि इनकी पुस्तकें भी नहीं पढ़ीं पर मुझे तो इनसे मिलके ये प्यारा अनुभव हूआ। इनकी प्यारी बातें व यादें हमेशा अब मेरे साथ हैं।

सतवंत कौर गोगी गिल
(वरिष्ठ कवयित्री, चंडीगढ़)

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DR.SANTOSH GARG POEMES डॉ. संतोष गर्ग की कविताएं :-

वंदना
नमन करूं मां शारदे को।
नित- नित नूतन ज्ञान मिले।।
ज्ञान के बिन है जीवन सूना ,
बस चरणों का ध्यान मिले।।

गीत, गजल और छंदों की
रचना करना जानूँ मां
वेद ग्रंथ ॠचाओं की
भाषा शैली, समझूँ माँ
सुनने की क्षमता देना
कान से अमृत पान मिले..।।
ज्ञान के बिन है जीवन सूना ,
बस चरणों का ध्यान मिले।।

किसी सभा में जब भी बैठूँ
मासा भर न गलती हो
पेड़ की भाँति झुकना सीखूँ
क्रोध की आग न जलती हो।
अहम् की जड़ भी न पाऊँ
बस इतना सम्मान मिले।।
ज्ञान के बिन है जीवन सूना ,
बस चरणों का ध्यान मिले।।

जब-जब लेखनी लिखने बैठे
देश हित बस कलम चले
चहुँ और जो कीर्ति फैले
नाम का भी अभिमान गले
बस ‘संतोष’ की यही है विनती, वर देने तू आन मिले।
ज्ञान के बिन है जीवन सूना ,
बस चरणों का ध्यान मिले।।


रचनाकार:- संतोष गर्ग, पंचकूला (चंडीगढ़)

बसंत

देख- देख! अरी सखी तू , आ गया बसंत।
बाल, वृद्ध युवा सभी को, भा गया बसंत .. सखी री आ गया बसंत।।

पेड़ देखो बिरह- अग्नि, पातों को गिरा रहा।
ठूँठ मन फिर से नईं कोपलें उगा रहा।
कभी-कभी तो नभ में बादल, आँख भी दिखा रहा।
चंद बूँद नेह भरी-2, बरसा गया बसंत..सखी री आ गया बसंत। बाल, वृद्ध, युवा सभी को भा गया बसंत..सखी री ..।।

प्रियतम जो रूठ कर घर से निकल गए।
राह देखे सांझ भई, न जाने किधर गए।
एक फोन कॉल पर वे, पल में फिसल गए।
मनमुटाव की दीवार ढा गया बसंत.. सखी री आ गया बसंत।
बाल- वृद्ध, युवा सभी को भा गया बसंत सखी री! आ गया बसंत।।

जिंदगी की डोर चाहे, कितनी भी कम हो।
तोड़कर दिखाए कोई, गर किसी में दम हो।
लाख आएँ मुश्किलें, न आँख कभी नम हो।
गीत जेल में वतन के, गा गया बसंत.. सखी री आ गया बसंत।
बाल, वृद्ध, युवा सभी को भा गया बसंत.. सखी री आ गया बसंत।।

झूम रहे पेड़ हैं, छाई हरियाली है। फूल- फल, भरी-भरी, एक- एक डाली है।
उदास भाव के लिए न, ठौर कोई खाली है।
खुशियाँ ‘संतोष’ मन को दे गया बसंत.. सखी री! आ गया बसंत। बाल- वृद्ध, युवा सभी को, भा गया बसंत.. सखी री! आ गया बसंत, सखी री आ गया बसंत।।
**

रचनाकार: संतोष गर्ग ‘तोष’

तिरंगा

घर – घर का श्रृँगार तिरंगा भगवान का अवतार तिरंगा।
किसी को लगता मात-पिता सा किसी को लगता यार तिरंगा।।
***
हर घर में जब दिखा तिरंगा
मैंने भी ले लिया तिरंगा ।
रेहड़ी, साइकिल, कार- स्कूटर
हर चोटी पर दिखे तिरंगा।।


जीवन की हर तार तिरंगा
उड़ता पंछी डार तिरंगा ।
खेले लाख चालाकी दुश्मन
पर रहता होशियार तिरंगा।।


पहरा देता जाग तिरंगा
ना रखता हथियार तिरंगा।
धर्म न जाति- मजहब देखे
इस भारत का सार तिरंगा।।


सबका प्यारा मीत तिरंगा
कवियों का है गीत तिरंगा।
वार करे न पीठ के पीछे
जाता फिर भी जीत तिरंगा।।


रचनाकार:- संतोष गर्ग, ‘तोष’ ✍️

जीवन का आधार कृष्ण।
करते हैं बेड़ा पार कृष्ण।।

उन जैसा न कोई सखा।
भटके को देते राह दिखा।।

जो लगते हैं सब अपने ही।
‘झूठे हैं’ देते कृष्ण बता ।।
संशय जब मन में आ जाए।
सुख चैन की नींद उड़ा जाए।।
फिर लकड़ी जैसे घुन की तरह
भीतर ही भीतर खा जाए।।

इसलिए कृष्ण तो कहते हैं –
भावों में बहना ठीक नहीं।
कोई अधिकार को छीने तो
नहीं माने तो ले धनुष उठा
भीतर का युद्ध ‘संतोष’ न दे
लड़ना है तो मैदान में आ‌
पापी तो पहले मरते हैं
सच्चे व्यक्ति से डरते हैं
सत्य ही सब का मीत सदा
सत्य की होती जीत सदा।।
**
रचनाकार –
डॉ. संतोष गर्ग ‘तोष’✍️

रिश्ते

रिश्तों की जो चाहते खूशबू।
अहम् को घर के आले रखना ।।

सुनते रहना सबके मन की।
अपनी जुबाँ पे ताले रखना ।।

कभी तो सहलाएँगे अपने ।
झूठे वहम ये पाले रखना ।।

वृद्धावस्था की लाठी को ।
अपने आप संभाले रखना ।।

उनके संग गुरबत करने को ।
कुछ तो पास में छाले रखना ।।

‘तोष’ गमों की मार के बुक्कल।

अपने शौक निराले रखना ।।

रचनाकार: –
संतोष गर्ग ‘तोष’ ✍️

शक्ति

दीवार की बिंदी कहती है
मेरे घर में शक्ति रहती है
जो लड़ती है तूफानों से
नहीं किसी बला से डरती है।

जिसे सत्य बहुत प्यारा है
जीने का ढंग न्यारा है
सोना, चांदी, हीरे- मोती
उसके आगे सब खारा है।

बस व्यवहार पे चलती है
जैसे कह दो वह ढलती है
उसकी बातों के आगे तो
नहीं दाल किसी की गलती है।

मेरे घर का, बोझा ढोती है
ना थकती है ना रोती है
चाहे दो, बजने को आएं
नहीं रातों को वह सोती है।

जब देखता हूं तो, जगती है
कब ऑंखें उसकी लगती हैं
नहीं पढ़ पाया मैं बरसों से
कब सोती है कब जगती है

वह अठारह घंटे काम करे
कहता हूं न विश्राम करे
कम में ‘संतोष’ को पा जाती
घर बाहर न कोहराम करे।
वह माया, मुझको ठगती है
मेरे घर में शक्ति रहती है।।


रचनाकार:-
डॉ. संतोष गर्ग ‘तोष’✍️

बसंत

कैसी आज बसंत की चढ़ी खुमारी देखो।
ओढ़ी सरसों ने पीली फुलकारी देखो।।

रंग- रंगीला हर इक बाग बगीचा है।
कुदरत के हाथों की चित्रकारी देखो।।

खेतों में किसान झूम के नाचे गाए।
खिली- खिली सी सरसों की सरदारी देखो।।

डोली में बैठी है दुल्हन पर्दा किए।
सजे बसंती सपने आज हज़ारी देखो।।

दूर गगन में डोर के संग पतंगें उड़ती।
पेचे पाते बच्चों की किलकारी देखो।।

युग- युग से भारत की मेले शान बने हैं।
सजते हाथी, घोड़े, ऊँट सवारी देखो।।

नुक्कड़ पर ही आज बने थे पीले चावल।
बाँट- बाँट के थक कर पड़ा भंडारी देखो।।

छटा है ऐसी देख-देख ‘संतोष’ न पाऊँ।
सुंदर- मनहर झांकी कितनी प्यारी देखो।।


रचनाकार:‐ डॉ. संतोष गर्ग ‘तोष’✍️

कान्हा रे मन्नै ले दे रे ओढ़नी .. कान्हा रे मन्ने ले दे रे ओढ़नी..
मैं तो हो-ली पूजन.. जाऊं-गी,

मन्ने ले दे रे ओढ़नी…।।

ओढनी लूँगी ललिता जैसी,
सुन ले तू वो होगी कैसी..
बीच-बीच में चाँद- सितारे,
लगा हो गोटा चहुँ किनारे,
सुच्चे काम की लूंगी.. ओढ़नी रे.. मन्ने ले दे रे ओढ़नी..।।

पिछले वर्ष तूने वादा किया था,
ले दूँगा गोरी नई री ओढ़नी,
गई दिवा…ली, आई होली,
गटकूँगी.. ना, मीठी गोली,
तेरी एक नहीं मैं मानूँगी..
मन्नै ले दे रे ओढ़नी …. ।।

हीरे का हार व कंगन टीका,
बिना ओढ़नी लगता फीका। लाल रंग का पहनूँ लहंगा,
ललिता से जो होगा महँगा…
मैं तो पीली ओढ़ूँ.. ओढ़नी रे ,
मन्नै ले दे रे ओढ़नी.।।

(फिर ..कान्हा कहते हैं..)
सुन ले राधे! बात तू मेरी ..
चोरी से लाया ओढ़नी तेरी।
किया जो वादा आज निभाऊँ, संग में होली पूजन जाऊं…।
ज़रा ओढ़ के तू दिखला दे री ..
मैं तो लाया री ओढ़नी ….
दोनों हो ली पूजन, जाएँगे..
मैं तो लाया री ओढ़नी…।।
***
रचनाकार:- डॉ. संतोष गर्ग✍

नव वर्ष पर प्रार्थना करते हुए डॉ. संतोष गर्ग ने कहा कि:-

मेरे इस देश का भगवन्
बस तू ही, इक बाली।
तेरे आदेश पे जग की
झुक जाती, हर डाली।।
मैं करती हूं, यही विनती
मेरे दाता, तेरे आगे..
न हो कभी बाल भी बांका,
दिखे कण- कण खुशहाली।।
मेरे इस देश का भगवन् ,
बस तू ही, इक बाली।।

एक पिता के उद्गार बेटी के लिए

जीवन संवार दिया, कुल को है तार दिया, ऐसी बेटी पर मुझे, बड़ा अभिमान है।
जितने भी दोहे, गीत लिख- लिख नाम पाऊं,
ऐसा लगे बेटी मेरे छंदों की ही जान है।।
लोगों में जो सुनता हूं, जब मैं बड़ाई बड़ी,
ऐसा लगे बेटी मेरी, हीरों की ही खान है।
आन- बान बनी मेरी, बेटी ही के नाम पर-२
बेटी ही तो मेरी पीली, पगड़ी की शान है।।

बेटी मेरी गीता बनी, बेटी मेरी भागवत, बेटी ही से मेरी अब, पद – पहचान है।

सपनों में बेटी देखूं, अपनों में बेटी देखूं , बेटी गंगा- यमुना मां, तीरथों का मान है।।
अब तो है ठान लिया, मन ने है मान लिया, बेटी गुरु, ज्ञान और, बेटी भगवान है।।
कहां मैं विफल हुआ, जीवन सफल हुआ, बेटी घर, गांव और बेटी हिंदुस्तान है।।


रचनाकार –
डॉ. संतोष गर्ग ‘तोष’✍️

गुरु शिष्य

सच्चा गुरु वही है जो
माता श्री जी की भांति
शिष्य के कच्चे- कच्चे
घड़े को आकार दे।
थोथी- थोथी बातों से तो
कुछ नहीं होने वाला
दे के एक झापड़ भी
थोड़ी फटकार दे।।

चले फिर वो अकेला
संग में न हो झमेला
पकड़ के हाथ फिर
जग से उभार दे।
उमरिया सारी जीवे
अमरित रस पीवे
दे के ‘संतोष’ धन
मन को सॅंवार दे।।


रचनाकार –
संतोष गर्ग ‘तोष’ ✍️

श्रम करने वालों की कभी हार नहीं होती। भयभीतों की नैया भव पार नहीं होती।।
जो धर्म निभाते हैं कांटों पर चलकर भी।

अपना हो पराया हो, पर हार नहीं होती।।
श्रम करने वालों की..।।

यह रंग रूप यौवन औरत के गहने हैं। जिसमें लज्जा न हो-2 वह नार नहीं होती।।
श्रम करने वालों की ..।।

यह ग्रंथ और गीता भी, उससे ही बनते हैं। 2
जिस मुख अपशब्दों की, तलवार नहीं होती।।
श्रम करने वालों की..।।

बिन मांगे मिलता है उस दर से सब कुछ ही-2
पापी की दुआ तो स्वीकार नहीं होती।।
श्रम करने वालों की..।।

मां-बाँह पकड़ लेती मारे भी संवारे भी।
हर भाग्य में गुरु की-2, फटकार नहीं होती।।
श्रम करने वालों की कभी हार नहीं होती।

भयभीतों की नैया भव पार नहीं होती।।

रचनाकार:
संतोष गर्ग ‘तोष’ ✍

प्रेम की पगडंडियों का रास्ता आसान नहीं ।
जिसने थामा इसका दामन बच पाया अभिमान नहीं।।

तीन लोक की रानी राधा,
हो गई थी बावली।
मीठे से इस बिरहा रस से
बच पाया भगवान नहीं..।।
प्रेम की पगडंडियों का रास्ता आसान नहीं।।

चाखा प्रेम का रस कबीरा
रहिमन, धन्ना, संतनी मीरा।
ढाई अक्षर प्रेम के थे,
कोई ऊंची शान नहीं।।
प्रेम की पगडंडियों का रास्ता आसान नहीं।।

भगत सिंह, सुखदेव, गुरु में,
कूट-कूट के प्रेम भरा था।
देखे जो फांसी के फँदे,
चुम्मा.. पाई जान नहीं।।
प्रेम की पगडंडियों का रास्ता आसान नहीं।।

प्रेम ईश्वर, प्रेम पूजा, प्रेम ही भगवान है।
प्रेम मांगता त्याग- समर्पण, लेना इसकी शान नहीं।।
प्रेम की पगडंडियों का रास्ता आसान नहीं ।।

प्रेम- पथ के राही गूँगे,
विरहा तू सुल्तान है।
लेना-देना इक है सौदा,
प्रेम जानता ज्ञान नहीं ।।
प्रेम की पगडंडियों का रास्ता आसान नहीं ।।

चेहरों को प्रेम है पढ़ता,
लिख देता ‘संतोष’ के मन की।
आँखों की भाषा न समझे,
इतना भी नादान नहीं ।।
प्रेम की पगडंडियों का रास्ता आसान नहीं।
जिसने थामा इसका दामन, बच पाया अभिमान नहीं ।।
*
रचनाकार:-
संतोष गर्ग ‘तोष’✍

काश कोई ऐसी जगह हो

काश कोई ऐसी जगह हो,
लगे सुरलोक जहां पर..।।

भूल ही जाए जलती शमां..2
है कलम स्याही कहाँ पर..।।

न सुर- संगीत की महफिल हो..2 करूं वाह-वाही वहां पर….।।

मगन हो चुप रहे मनवा..2
चले न राही वहां पर ..।।

लगे ‘संतोष’ में ऐसा ही.. 2
है मेरा माही वहां पर ..।।

काश कोई ऐसी जगह हो,
लगे सुरलोक जहां पर।।


रचनाकार:
संतोष गर्ग ‘तोष’✍️

आ दोनों मिलकर

आ दोनों मिलकर गीत लिखें।
प्रेम- प्यार के ढाई अक्षर,
कोरे पन्ने प्रीत लिखें ।।
आ दोनों मिलकर गीत लिखें।।

जिसमें न अखियाँ बहती हों।
बस हँस-हँसकर सब कहती हों।। सूरज सी चमकती रहती हों..
उन दो नैनों की ज्योति से
रूप रंग की जीत लिखें।
आ दोनों मिलकर गीत लिखें।।

जब इश्क की घंटी बज जाए।
तन- मन पे मुरली सज जाए।। अपना- बेगाना तज जाए।
नन्ही उंगली से अधरों पर,
सा-रे- गा सुर संगीत लिखें।
आ दोनों मिलकर गीत लिखें।।

हाथों में हाथ जब तेरा हो।
फिर जग का कण-कण मेरा हो।।
तेरे कदमों में बसेरा हो।
फिर कलम- स्याही लेकर हम..
‘एल ओ वी ई’ भीत लिखें।
आ दोनों मिलकर गीत लिखें।।

यह धरा- गगन सब अपना हो।
दिखता ‘संतोष’ को सपना हो।।
बस ‘मैं’ में ‘तू’ ही जपना हो।
जो शीतल कर दे दोनों को,
वह रंग- रंगीली जीत लिखें।
आ दोनों मिलकर गीत लिखें।।
प्रेम- प्यार के ढाई अक्षर ..
कोरे कागज प्रीत लिखें।
आ दोनों मिलकर गीत लिखें।।


रचनाकार:
संतोष गर्ग ‘तोष’✍️

सात मंगल दोहे (डॉ. संतोष गर्ग)

1.
भोर भई दर्शन मिले, सेवा में है मोर।
कृष्ण अधर मुरली सजे, राधे काजल कोर।।


2.
राधे अपनी स्वामिणी, कृष्ण बने चित्तचोर।
दोनों की जोड़ी लगे, अद्भुत कहता मोर।।


3.
प्रेमी मन को भा गए, राधे नंदकिशोर।
वर्णन अब कैसे करूँ, सोचे मोर हिलोर।।


4.
मुरली है बड़भागिनी, कान्हा के जो हाथ।
मोर देखता ओढ़नी , राधे के जो माथ।।


5.
भाग्य जगे कदंब के, बैठ गये घनश्याम।।
मुरली की धुन से लिये , कितनों के दिल थाम।।


6.
जिधर चली हैं राधिके, उधर चले चितचोर।
चरणों में राधे रहूँ , बोले नित नित मोर।।


7.
राग, मान, हठ, दंभ में, रहती है ‘संतोष’।
चरण- शरण विनती प्रभो! दूर करो सब दोष।।


रचनाकार:- डॉ. संतोष गर्ग, ‘तोष’ ✍

कुंडलिया छंद

रोटी
रोटी- रोटी सब करें, रोटी है भगवान।।
उनसे बढ़कर कौन है, जो हैं करते दान।।
जो हैं करते दान, नाम है होता रौशन। अन्न भरे है पेट, सभी का करता पोषण।।
कहती है ‘संतोष’, कहो न पतली मोटी।
देगी हर दिन साथ, यही बस अपनी रोटी।।


प्रार्थना
बस हरदम रटती रहूॅं, श्यामा तेरा नाम।
दिन हो चाहे रात हो, भले हो सुबह शाम।।
भले हो सुबह शाम, कभी मैं भूल न पाऊं।
ग़लत यदि हो काम, तभी झटपट से ध्याऊं।।
कहती है ‘संतोष’, बसे हो मेरी नस-नस।
जपूॅं सदा घनश्याम, करुॅं मैं कभी न बस- बस।।


धर्म
अपना धर्म बुरा कहे, पागल वो इंसान।।
ऐसे अधम- आदम का, कौन करे सम्मान।।
कौन करे सम्मान, दूर तुम उससे रहना।
कभी न घर की बात, भूल कर मानव कहना।।
कहती है ‘संतोष’, न लेना ऐसा सपना।
जिसमें कहना पड़े, धर्म न अच्छा अपना।।


वे लोग
अपनी- अपनी वे कहें, सुनें न कोई बात।
कैसे-कैसे लोग हैं, करें कलेजे घात।। करें कलेजे घात, डरें न क्रूर प्राणी।‌ यही उनका स्वभाव, किसी की एक न मानी।
कहती है ‘संतोष’, हाथ लो माला जपनी।
भले लगा लो ज़ोर, न इनसे खपनी -अपनी।।


गुरु
मानी है गुरु आपकी, सकल- जगत ने बात।
होगा वह नादान ही, जो दे गुरु को मात।।
जो दे गुरु को मात, लाल वो सबसे न्यारा।।
जग में चमके रवि, कवि वो गुरु का प्यारा।
कहती है ‘संतोष’, न कोई गुरु सम झानी।
गुरु की महिमा तीन लोक ने सदियों मानीं।।


रचनाकार:
डॉ. संतोष गर्ग ‘तोष’ ✍️

विश्व पर्यावरण दिवस पर ‘धरा’ गीत

पौध रोप कर आओ करें हम, अपनी धरती का श्रृंगार।
रंग बिरंगे फूल खिलेंगे खुश होंगे हम बारम्बार।।

इस धरती पर जन्म लिया है, मां जैसी यह लगती है।
उंगली पकड़कर चलना सिखाती, सोऊं तो ये जगती है।।
ठोकर खा कर गिर न जाऊं, पल- पल डरती रहती है।
ज़ख्म कहीं हों कितने गहरे, चुप रह कर ये सहती है।।
उसे ही भर- भर धन है देती, जो करता इसका सत्कार।
पौध रोप कर आओ करें हम
अपनी धरती का श्रृंगार।।

हम जो बो जाएंगे कल अपने बच्चे पाएंगे।
छाया लेंगे ठंडी- ठंडी, फल तोड़ कर खाएंगे।।
नव पीढ़ी को दे जाएं हम, नन्हा सा बस यह उपहार।
पौध रोप कर आओ करें हम अपनी धरती का श्रृंगार।।

अगर धरा हो अपनी सुंदर, सब कुछ अच्छा लगता है।
हरी- भरी हो डाल-डाल तो, जीना सच्चा लगता है।।
स्नेह- प्रेम से सींच- सींच कर, कुछ तो शीतल कर जाएं।
आ जाए ‘संतोष’ हमें भी, गागर इसकी भर जाएं।।
भरी दोपहरी तपती है ये, कोई न जाने इसका सार।
पौध रोप कर आओ करें हम, अपनी धरती का श्रृंगार।
रंग-बिरंगे फूल खिलेंगे, खुश होंगे हम बारंबार।।
**
रचनाकार:- डॉ. संतोष गर्ग ‘तोष’, पंचकूला✍️

माहिया छंद
1.
कर फोन बुलाएंगे।
ढोलक ताली से,
मिलजुल कर गाएंगे।।
*
2.
सपनों में आता है।
कैसा छलिया है,
आंखें मटकाता है।।


3.
तुम दूर नहीं जाना।
जो दिल ने चाहा,
औरों के हो जाना।।


4.
घर तेरे रहना है।
सच को झूठ कहो,
बस हां- हां कहना है।।


5.
हाथों को चूम लिया।
बस गलबकड़ी से..
भारत मैं घूम लिया।।


6.
हाथों को चूम लिया।
नैन शराबी थे..
बिन पीए झूम लिया।।


7.
बातों में हार गया।
‘तू मेरी’ कह के..
हाए वो मार गया।।


रचनाकार:-
डॉ. संतोष गर्ग ‘तोष’, पंचकूला✍️

वक्त

इस वक्त का पहिया गोल-गोल
मैं झूठ ना बोलूं अनुभव कहता
ले तकड़ी में तोल- तोल
इस वक्त का पहिया गोल-गोल।।

कोई बंगलों में रहता है
कोई कुटिया में रहता है
कोई सड़कों पे जाग-जाग
दु:खड़े न मन के कहता है
हर कोई भोगे कर्म का लेखा
हर कोई अपनी सहता है
रातें भी गोल, बातें भी गोल
यादें भी गोल, वादे भी गोल
मैं झूठ ना बोलूं अनुभव कहता,
ले तकड़ी में तोल- तोल
इस वक्त का पहिया गोल-गोल।।

कभी सर्दी है, कभी गर्मी है
कभी पतझड़ है तो वर्षा है
कभी मिलें खीर और पूड़े भी
कभी जल को जन-जन तरसा है
कभी देख धरा के दु:खड़े को
बिन मौसम बादल बरसा है
धरती भी गोल, अंबर भी गोल
सूरज भी गोल, चंदा भी गोल
मैं झूठ न बोलूं अनुभव कहता
ले तकड़ी में तोल- तोल
इस वक्त का पहिया गोल-गोल।।


रचनाकार:-
डॉ .संतोष गर्ग ‘तोष’, पंचकूला✍️

छंद , कान्हा, सावन, पावन, सागर
शब्दों पर 5 दोहे

1.
छंद
छंद लिखे जब लेखनी, पाए अति आनंद।
भॅंवरा जैसे हर कली, चूमे मन- मकरंद।।


2.
कान्हा
कान्हा तेरे प्रेम की, प्यासी मैं दिन रैन।
सोऊं तो नींदें नहीं, जागूं बरसें नैन।।


3.
सावन
सावन की कलियां कहें, प्रियतम हमसे दूर।
विरहा अब कैसे सहें, मिलने को मजबूर।।


4.
पावन
पावन धरती हिन्द की, पावन इसकी धूल।
नलके, नदिया, कुऍं भी, पावन इसकी मूल।।


5.
सागर
खारे जल का है भरा, सागर उछले खूब।।
नदी कहे ‘संतोष’ से, डूब सके ना दूब।।


रचनाकार –
संतोष गर्ग ‘तोष’ ✍️

बच्चों की कविताएं

पृथ्वी मां को समर्पित चंद भाव

धरती कहे पुकार के -2
हे मानव तू जग में आ के
कर्म तू करना लाज बचा के
चलना सदा तू शीश उठा के
मत जाना तू हार के….।
धरती कहे पुकार के..।।

हे मानव! तू जीत के जाना
दया- धर्म के फूल उगाना
तिल जितना न दाग लगाना
सब दूं तुझ पर वार के ….।
धरती कहे पुकार के..
धरती कहे पुकार के ..।।


रचनाकार:- संतोष गर्ग ‘तोष’, पंचकूला ✍️

चिड़िया

घर में नन्हीं चिड़िया आए।
नाच- नाच कर मुझे दिखाए।।

कभी तो जल की टूटीं बैठे।
अमरूद में चोंच गड़ाए।।
कभी अनार के पेड़ पे बैठे।
रोटी का वो टुकड़ा खाए।।
कभी नन्हें से तिनके ला कर
स्वयं ही अपना घर बनाए।।

पूछूं मैं ‘कहां तू रहती’
जहां ‘संतोष’

‘वहां हूं’ कहती।।

रचनाकार:- डॉ. संतोष गर्ग ‘तोष’✍️

रंग
नकली रंगों से
कुदरत के रंग अच्छे
प्रेम की भाषा
हर कोई समझे
समझें नाजुक बच्चे।
नकली रंगों से ….।।

हरे रंग के बाग बगीचे
फूल है रंग रंगीले
जामुनी, बैंगनी, लाल- गुलाबी कुछ है नीले पीले
चंदन सी खुशबू से महकें
बच्चे मन के सच्चे।
नकली रंगों से …।।

कल-कल करती नदिया कहती,
बच्चों कभी न रुकना
यदि हो चाहते पर्वत होना
सब के आगे झुकना
बस मेरा संदेश यही ..
सुनो! बदामी लच्छे
नकली रंगों से
कुदरत के रंग अच्छे..।।


रचनाकार:-
डॉ. संतोष गर्ग ‘तोष’✍️

बच्चों की कविताएं
पुस्तक :कागज़ की कश्ती *
लेखिका: डॉ.संतोष गर्ग ‘तोष’, पंचकूला
(हरियाणा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी द्वारा पुरस्कृत रचनाकार)

1 .
भारत देश हमारा है।
हमें जान से प्यारा है।।
इसकी रक्षा करेंगे हम।
नहीं किसी से डरेंगे हम।।
***

2 .
कृष्ण-कन्हैया काला-काला ।
कितना प्यारा वंशी वाला।।
दूध-दही-माखन को खाता।
मीठे-मीठे गीत सुनाता।।
***

3 .
हँसो और हँसाओ बच्चो।
कभी नहीं शरमाओ बच्चो।।
सबको गले लगाओ बच्चो।
दुःख से छुट्टी पाओ बच्चो।।
***

4 .
मुझे मार ना मेरी माता।
बेटी हूँ मैं तेरी माता।।
पढ़-लिख कर मैं काम करूँगी।
देश का ऊंचा नाम करूंगी।।
***

5 .
हँसते हैं-मुस्काते हैं, हरे भरे ये पेड़।
हर मन को लुभाते हैं, हरे भरे ये पेड़।।
फल-फूल ले आते हैं, हरे भरे ये पेड़।
अपना प्यार लुटाते हैं, हरे भरे ये पेड़।।


6 .
सूरज के आने से पहले
दादी आ कर मुझे जगाए ।
उठो! प्यारा बेटा! कहकर
राम-राम कह मुझे हिलाए।।
जल्दी से उठ जाता हूँ
आलस दूर भगाता हूँ।
मात-पिता, दादा-दादी के,
चरणीं शीश झुकाता हूँ।।
***

7 .
सैर कर बहुत जरूरी ।
इसके बिन हर बात अधूरी।।
मोटा पेट हो जाता है।
कई बीमारी लाता है।।
***

8.
मान्या जब भी होती खाली।
आसन मार बजाती ताली।।
छोटे-छोटे हाथ देखकर।
खुश हो जाता बाग का माली।।
***

9 .
मदद सभी की करना तुम।
कभी न पीछे रहना तुम।।
रम्या सबका करती काम।
उसको मिलते कई ईनाम।।
***

10 .
हरी सब्जियाँ खाती हूँ।
कभी न नाक चढ़ाती हूँ।।
घीया, तोरी, टिंडा, पेठा।
देख के मैं मुस्काती हूँ।।
चावल, छोले, दाल, दही तो।
बड़े मजे से खाती हूँ।
***

11 .
पैसा सबसे बड़ी सौगात।
पैसे से बनती सब बात।।
चाहते हो जो इसको पाना।
थोड़ा-थोड़ा रोज़ बचाना।।
मम्मी-पापा के संग जाकर।
माटी का गुल्लक ले आना।।
जो भी दादू पैसे देंगे।
जल्दी से फिर उसमें पाना।।
***

12 .
नानी-नानी जल्दी आना।
चिजलिंग और केक भी लाना।।
सपनों की परियों के जैसी।
मेरी एक फ्रॉक बनाना।।
***

13 .
प्रिशा मेरी प्यारी बहना।
उसके कितने सुंदर नैना।।
नाच-नाच कर मुझे दिखाए।
‘दीदी-दीदी’ रोज़ बुलाए।।
***

14 .
मेरा जन्मदिन आएगा
घर में खुशियाँ लाएगा।
नानू-नानी आएँगे
खूब खिलौने लाएँगे।।
झट से हो जाऊँ मैं तैयार
दोस्त लाएँगे उपहार।
टाफी-केक मंगाएँगे
मिल बाँट के खाएँगे।।
***

15
मेरा घर है इतना सुंदर।
लगता जैसे कोई मंदिर।।
छोटा सा है एक बगीचा।
प्रेम-प्यार के जल से सींचा।।
***

16 .
पौधे खूब लगाना बच्चो।
कुछ तो पेड़ उगाना बच्चो।।
ठंडी-ठंडी छाया देंगे।
मीठे फल तुम खाना बच्चो।।
***

17
गुरू जी मेरे कितने अच्छे।
बोल-बोलते मीठे सच्चे।।
सब बच्चों का रखते ध्यान।
नेक बनो तुम देते ज्ञान।।
***

18
बच्चो देश की खातिर जीना।
चलना चौड़ा करके सीना।।
तिरंगे को नहीं दाग लगाना।
भारत की तुम लाज बचाना।।
***

19
वर्षा आई-वर्षा आई
गर्मी से है छुट्टी पाई ।
वर्षा में नहाएँगे
कुछ तो जल बचाएँगे।।
कागज की बनाकर कश्ती
अपना जहाज चलाएँगे।
इन्द्रधनुषी रंग खिलेंगें
मेंढ़क खूब टर्राएँगे।।
मम्मी के हाथों की चाय
गर्म पकौड़े खाएँगे।।
***

20 .
मेहनत करके खाओ भाई।
कभी न जी चुराओ भाई।
मांगने वाले रहते भूखे।।
बोल बोलते सच्चे झूठे।
मांग कर चुपड़ी न खाओ।।
चाहे भूखे ही सो जाओ।
मांग सभी को नीचा करती।।
इज्जत खातिर दुनिया मरती।
***

21 .
कितनी धुंध, कितनी सर्दी
सूर्य ने पहनी, धुंध की वर्दी।
पक्षी देख-देख के हारे
कब सूर्य ये वर्दी उतारे।।
कब आएगी धूप की रानी
देगी हमको दाना पानी।
पेट में चूहे कूद रहे हैं
ठंड से आँखें मूँद रहे हैं।।
देख-देख के सब थे हारे
कब सूर्य यह वर्दी उतारे।
कोयल रानी आगे आई,
फोन उठा कर वह मुस्काई।
नमस्कार-नमस्कार
सूर्य देव नमस्कार।
दर्शन दो, दर्शन दो
नन्हें बालक करते याद।
आया-आया कोयल रानी,
तेरी कितनी मधुर है वाणी।
तुमने मनको लिया जीता
जल्दी सुना दो मीठा गीत।।
सुनकर सूर्य दौड़ा आया
जल्दी से वर्दी को हटाया।
हा-हा-हा-हा धूप खिली है,
ठंड से सबको राह मिली है।
पेट भर कर सब ने खाया
खुशियों का विगुल बजाया।
खा-पीकर फिर छेड़ा नाद
धन्यवाद- धन्यवाद
कोयल मैडम धन्यवाद।।
***

22
आओ मिल खत्म करें
नशे की बीमारी को।
समझ न पाए जो,
देश की लाचारी को।।
दीमक की भाँति,
प्रतिभा को चाट रहा।
नशे का व्यापार,
रिश्तों को बाँट रहा।।
***

  1. भारत की इस पुण्य धरा को,
    मिलकर शीश झुकाते हैं।
    आओ नई सोच को लेकर
    कुछ तो कर दिखलाते हैं।।
    मेरे देश के वीर बहादुर
    खेलें अपनी जान पे
    सरहदों की रक्षा करते
    मिटे देश की आन पे
    हम भी दुश्मन को घुड़की दे
    नाकों चने चबाते हैं।
    भारत की इस पुण्य धरा को
    मिलकर शीश झुकाते हैं।।
    *** 24 .
    अलार्म ने घंटी है बजाई।
    मीठे सपनों से मैं जगाई।।
    दाईं ओर फिर करवट लेकर
    फिर से ओढ़ी थी रजाई।
    आलस ने आ मुझको घेरा।
    निंदिया ने फिर किया बसेरा।।
    ऊँचा स्वर पापा का सुनकर।
    बैंड बजा था झटपट मेरा।।

आखिर ऐसी शामत आई।
मम्मी ने इक चपत लगाई।।
रह गया सारा काम अधूरा।
होम वर्क भी था न पूरा।।

अगर अलार्म से उठ जाती।
टीचर मुझको न धमकाती।।
अच्छी मैंने शिक्षा पाई।
झट से छोडूं अब रजाई।।
***


  1. नकली रंगों से
    कुदरत के रंग अच्छे
    प्रेम की भाषा
    हर कोई समझे
    समझें नाजुक बच्चे।
    नकली रंगों से
    कुदरत के रंग अच्छे।।

हरे रंग के बाग बगीचे
फूल हैं रंग-रंगीले
जामुनी, बैंगनी, लाल, गुलाबी
कुछ हैं नीले-पीले
चंदन सी खुश्बू से महकें
बच्चे मन के सच्चे।
नकली रंगों से
कुदरत के रंग अच्छे।।

कल-कल करती नदिया कहती
बच्चो, कभी न रूकना
यदि हो चाहते सागर होना
सबके आगे झुकना।
बस मेरा संदेश यही-2
सुनो! बादामी लच्छे,
नकली रंगों से
कुदरत के रंग अच्छे।।
***

26 .
मैं, मम्मी-पापा और छाया।
सबके मन में ख्याल आया।।
दादी माँ को पढ़ने बैठाएं।
साक्षरता अभियान चलायें।।
जब दादी को बात बताई।
तब तो ऐसी शामत आई।।
दादी माँ ने हमको डाँटा।
गाल पे मेरे मारा चाँटा।।
कहती, “तुमको शर्म न आई।
क्यों करते हो जग हँसाई।।
बच्चों अब मैं क्या पढूंगी।
पाठ को कैसे याद करूँगी”।।
दादी पढ़ना बहुत जरूरी।
इसके बिना हर बात अधूरी।।
नैट का अब समय है आया।
तुमने अब तक कुछ न पाया।।

सोच-सोच जब दादी हारी।
बात समझ तब आई सारी।।
व्हाट्सऐप पे चैट करूंगी।
सी ए टी मैं कैट पढ़ूँगी।।
मैं मम्मी पापा और छाया।
सबका मन अति हर्षाया।।
पापा कलम दबात लाए।
दादी माँ स्कूल अब जाए।।


27 .
राखी का त्यौहार है आया
स्नेह, रक्षा का थाल सजाया।
सज-सँवर कर बैठी बहना
उसके आनंद का क्या कहना।
जब चाँद सा भैया आया
बहना का मन अति हर्षाया।
बाँध के प्रेम प्यार का धागा
बहना ने फिर गीत गाया।
भैया मेरे! राखी के बंधन को निभाना
भैया मेरे! छोटी बहन को न भुलाना।।

विद्वानों के संग

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सौभाग्यवश राष्ट्रीय कवि संगम चंडीगढ़ के कार्यक्रम में मुख्य अतिथि पंजाब यूनिवर्सिटी के प्रो. डॉक्टर वीरेंद्र मेहंदी रत्ता को सादर भेंट देते हुए

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एक शाम शहीदों के नाम’ चंडीगढ़ में हरियाणा के पूर्व विधानसभा अध्यक्ष श्री ज्ञानचंद गुप्ता जी एवं आचार्य कुल संस्था के अध्यक्ष श्री के के शारदा जी के कर कमलों द्वारा सम्मानित होते हुए

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साक्षात्कार

चंडीगढ़ संगीत नाटक अकादमी के पूर्व अध्यक्ष बहुआयामी प्रतिभा के धनी श्री कमल अरोड़ा जी के साथ साक्षात्कार

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अभिनेता पंकज बेरी के साथ साक्षात्कार

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स्टैंड अप कॉमेडियन राजीव मल्होत्रा जी के साथ

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विश्व विख्यात कबीर वाणी गायक अरुण गोयल के साथ साक्षात्कार

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एक साक्षात्कार गायक बृजेश आहूजा के साथ

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एक साक्षात्कार: गायक अभिनेता और संगीत निर्देशक बृजेश आहूजा के साथ

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